Durga Kavach
सर्वरक्षा करणम् श्री दुर्गा कवचम्
विनियोग मन्त्र:
ॐ अस्त्र श्री चंडीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि, अनुष्टुप् छन्द:,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्,
दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् श्री जगदम्बाप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:।।
ॐ नमश्चंडिकायै।। (ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।)
इस चण्डिका मन्त्र के 108 जप करें।
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यदगुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्,
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह।। 1 ।।
मार्कण्डेय जी ने कहा — पितामह! जो इस संसार में परमगोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये।
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्,
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छ्रणुष्व महामुने।। 2 ।।
ब्रह्माजी बोले— ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी,
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। 3 ।।
पञ्चमं स्कन्धमातेति षष्ठं कात्यायनीति च,
सप्तमु कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। 4 ।।
नवम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गा:प्रकीर्तिता:,
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।। 5 ।।
देवी के नौ रूप हैं, जिन्हें ‘नवदुर्गा’ कहते हैं। प्रथम रूप शैलीपुत्री है। दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथा कूष्माण्डा है। पाँचवी दुर्गा का नाम स्कन्ध माता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं।
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे,
विषमे दुर्गमे चैव भयार्त्ता: शणं गता: ।। 6 ।।
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे,
नापदं तस्य पश्चामि शेकदु:खभयं न हि।। 7 ।।
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फंस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता। युद्ध के समय, संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती।
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते,
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशय:।। 8 ।।
जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो।
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना,
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना।। 9 ।।
चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं। वाराही भैंस की सवारी करती हैं। एंन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरूड़ पर ही आसन जमाती है।
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना,
लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया।। 10 ।।
माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती है। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान है और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं।
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना,
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता।। 11 ।।
वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई है और सब प्रकार के आभूषण से विभूषित है।
इत्येता मातर: सर्वा: सर्वयोगसमन्विता:,
नानाभरणशोभढ्या नानारत्नोपशोभिता: ।। 12 ।।
इस प्रकार से सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इसके सिवा और भी बहुत सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं।
दृश्यन्त रथमारूढा देव्य: क्रोधसमाकुला:,
शङ्खं चक्रं गदां शक्ति हलं च मुसलायुधम्।। 13 ।।
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च,
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शाङ्र्गमायुधमुत्तमम्।। 14 ।।
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च,
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै।। 15 ।।
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी दिखायी देती हैं। शंख, चक्र, गदा, शक्ति हल और मूसल, ,खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ग धनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना-यही उनके शस्त्र धारण का उद्देश्य है।
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे,
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि।। 16 ।।
महान रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुम महान भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है। (कवच आरम्भ करने से पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए।)
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि,
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता।। 17 ।।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी,
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी।। 18 ।।
तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें। अग्निकोण में अग्निशक्ति, दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खंगधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारूणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करें।
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी,
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा।। 19 ।।
उत्तर दिशा में कौमारी और ईशानकोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणी! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे।
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना,
जया मे चाग्रत: पातु विजया पातु पृष्ठत:।। 20 ।।
इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करे। जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करें।
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता,
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता।। 21 ।।
वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे।
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी,
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके।। 22 ।।
ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्यभाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे।
शिङ्खनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी,
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी।। 23 ।।
दोनों नेत्रों के मध्यभाग में शंखिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शॉकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका,
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती।। 24 ।।
नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती रक्षा करे।
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका,
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके।। 25 ।।
कौमारी दाँतों और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा देवी गले की और महामाया तालू में रहकर रक्षा करे।
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला,
गीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।। 26 ।।
कामाक्षी ठोड़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठ वंश (मेरूदण्ड) में रहकर रक्षा करे।
नीलग्रीवा बहि:कण्ठे नलिकां नलकूबरी,
स्कन्धयो: खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्र धारिणी ।। 27 ।।
कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खंगिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे।
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च,
रखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी।। 28 ।।
दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि की रक्षा करे।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मन: शोकविनाशिनी,
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी।। 29 ।।
महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रह कर रक्षा करे।
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा,
पुतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी।। 30 ।।
नाभि में कामिनी और गुह्यभाग में गुह्योश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे।
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी,
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी।। 31 ।।
भगवती कटिभाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबली देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी,
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी।। 32 ।।
नारसिंही दोनों घुछियों की और तेजसी देवी दोनों चरणों की पृष्ठ भाग की रक्षा करे। श्री देवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे।
नखान् द्रष्ट्राकराली च केशांश्वैवोर्ध्वकेशिनी,
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा।। 33 ।।
अपनी दाढ़ों के कारण भयंकर दिखायी देने वाली द्रंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्व केशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों की कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करे।
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती,
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकेटेश्वरी।। 34 ।।
पार्वती देवी रक्त, मज्जा, माँस, हड्डी और मेद की रक्षा करें। आंतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे।
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा,
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु।। 35 ।।
मूलाधार आदि कमलकोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी नख से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त सन्धियों में रहकर रक्षा करे।
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा,
अहंकारं मनो बुद्धि रक्षेन्मे धर्मधारिणी।। 36 ।।
ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करे। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करे।
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्,
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना।। 37 ।।
हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे।
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी,
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा।। 38 ।।
रक्षा, रूप, गंध, शब्द और स्पर्शदि विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा सदा करे तथा सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे।
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी,
यश: कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी।। 39 ।।
वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे।
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके,
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी।। 40 ।।
इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करे। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करेा। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा,
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वत: स्थिता।। 41 ।।
मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकारी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु,
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी।। 42 ।।
देवी! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो, क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो।
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मन:,
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति।। 43 ।।
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजय: सार्वकामिक:,
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्।। 44 ।।
यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय, कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उस को निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलना रहित महान ऐश्वर्य का भागी होता है।
निर्भयो जायते मर्त्य: संग्रामेष्वपराजित:,
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्य: कवचेनावृत: पुमान्।। 45 ।।
कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध से उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है।
इदं तु देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभम्,
य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वित:।। 46 ।।
दैवी कला भ्ज्ञवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजित:,
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित:।। 47 ।।
देवी का कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु से रहित ही सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूताविस्फोटकादय:,
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्।। 48 ।।
मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती है। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, सांप और बिच्छू आदि काटने से चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष-ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं उनका कोई असर नहीं होता।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले,
भूचरा: खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिका:।। 49 ।।
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा,
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला:।। 50 ।।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:,
ब्रह्मराक्षसवेताला: कूष्माण्डा भैरवादय:।। 51 ।।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते,
मानोन्नतिर्भवेद् रास्तेजोवृद्धिकरं परम्।। 52 ।।
इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने अभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मंत्र, यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं पृथ्वी पर विचरने वाले ग्राम देवता आकाशचारी देवविशेष, जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले देवता, कुल देवता, कण्ठमाला आदि रोग, डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला उत्तम है।
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले,
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा।। 53 ।।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्,
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संतति: पुत्रपौत्रिकी।। 54 ।।
कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्,
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसाद:।। 55 ।।
फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते।। ॐ ।। 56 ।।
वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता है और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है।
इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम्।
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