Yamuna Kavach
श्री यमुना कवचम्
मान्धातोवाच
यमुनाया: कृष्णराज्ञा: कवचं सर्वताऽमलम्।
दहि मह्यं महाभाग धारयिष्याम्यहं सदा ।। 1 ।।
सौभरिरुवाच
यमुनायाश्र्च कवचं सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
चतुष्पदार्थदं साक्षाच्छृणु राजन्महामते।। 2 ।।
कृष्णां चतुर्भुजां श्यामां पुण्डरीकदलेक्षणाम्।
रथस्थां सुन्दरीं ध्यात्वा धारयेत्कवचं तत:।। 3 ।।
स्नात: पूर्वमुखो मौनी कृतसंध्य: कुशासने।
कुशैर्बद्वशिखो विप्र: पठेद्वै स्वस्तिकासन:।। 4 ।।
यमुना मे शिर: पातु कृष्णा नेत्रद्वयं सदा।
श्यामा भ्रूभंगदेशं च नासिकां नाकवासिनी।। 5 ।।
कपोलौ पातु मे साक्षात्परमानन्दरूपिणी।
कृष्णवामांससंभूता पातु कर्णद्वयं मम।। 6 ।।
अधरौ पातु कालिन्दी चिबुकं सूर्यकन्यका।
यमस्वसा कंधरां च हृदयं मे महापदी।। 7 ।।
कृश्णप्रिया पातु पृष्ठं तटिनी मे भुगद्वयम्।
श्रोणीतटं च सुश्रोणी कटिं मे चारुदर्शना।। 8 ।।
उरुद्वयं तु रंभारूर्जानुनी अधिमेदिनी।
गुल्फौ रोश्र्वरी पातु पादौ पापापहारिणी।। 9 ।।
अंतर्बहिरधश्चोर्ध्वं दिशासु विदिशासु च।
समंतात्पातु जगत: परिपर्णतमप्रिया।। 10 ।।
इदं श्रीयमुनायाश्च कवचं परमाद्भुतम्।
दशवारं पठेद्भक्त्या निर्धनो धनवान् भवेत।। 11 ।।
त्रिभिर्मासै: पठेद्भीमान् ब्रह्मचारी मिताशन:।
सर्वराज्याधिपत्यं च प्राप्नोति नात्र संशय:।। 12 ।।
दशोत्तरशतं नित्यं त्रिमासावधि भक्तित:।
य: पठेत्प्रयतो भूत्वा तस्य किं किं न जायते।। 13 ।।
य: पठेत्प्रातरुत्थाय सर्वतीर्थफलंलभेत्।
अंते व्रजेत्परं धाम गोलोकं योगिदुर्लभम्।। 14 ।।
इति श्रीमद्रर्गाचाऽर्य: संहितायां श्रीमाधुर्यखण्डे श्रीसौभरिमान्धातृसंवादे श्रीयमुनाकवचं समाप्तम्
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