Satyanarayan Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा
पूजन विधि
श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूर्णिमा व संक्रांति के दिन शाम के समय स्नानादि से निवृत्त होकर करनी चाहिए। पूर्व की ओर मुख करके पूजा स्थान में आसन पर बैठकर श्रद्धापूर्वक श्री गणेश, गौरी, वरुण, विष्णु आदि देवताओं का ध्यान करके पूजन करें, और संकल्प करें कि मैं सत्यनारायण स्वामी का पूजन तथा कथा श्रवण करता रहूँगा। पुष्प हाथ में लेकर सत्यनारायण भगवान् का ध्यान कर यज्ञोपवीत, पुष्प, धूप, नवैद्य आदि अर्पित कर स्तुति करें—
‘’हे भगवान। मैं श्रद्धापूर्वक फल, जल आदि सामग्री आपको अर्पण कर बारंबार नमस्कार करता हूँ। कृपया अपने भक्त द्वारा की गई आराधना स्वीकार करो।‘’
तत्पश्चात् श्री सत्यनारायण भगवान की कथा श्रवण करें या पढ़ें।
पूजन सामग्री
केले के खम्भे, पंचपल्लव, कलश, पंचरत्न, चावल, कपूर, घूप, पुष्पों से बनी माला, श्रीफल (नारियल), ऋतुफल, अंगवस्त्र, कलावा, आम के पत्ते, यज्ञोपवीत, वस्त्र, गुलाब के फूल, घी का दीपक, तुलसी दल, पान, पंचामृत (दूध, दही, गंगाजल, शहद, शक्कर), केशर, बन्दनवार, चौकी।
श्री सत्यनारायण व्रत कथा आरम्भ
।।श्री गणेशाय नम:।। श्री गणेशाय नम:।। श्री गणेशाय नम:।।
प्रथम अध्याय
व्यास जी ने कहा-
“एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अट्ठासी हजार ऋषियों ने पुराणवेत्ता श्री सूत जी से पूछा-
“हे सूत जी, इस कलियुग में वेद-विद्या-रहित मानवों को ईश्वर भक्ति किस प्रकार मिलेगी और उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनिश्वर! आप ऐसा कोई व्रत अथवा तप बताइये जिसे करते से मनुष्य थोड़े ही समय में पुण्य प्राप्त कर सके और उसे मनोवांछित फल भी मिले। ऐसे मनोरथ पूर्ण करने वाली कथा सुनने की हमारी प्रबल इच्छा है।”
सर्वशास्त्रज्ञाता श्री सूत जी बोले-
“हे वैष्णों के पूज्य! आप सभी ने मानव जाति के हित की बात पूछी है। अत: आप सबके अनुरोध पर मैं उस श्रेष्ठ व्रत को अवश्य कहूँगा जिसे नारद जी ने एक समय श्री लक्ष्मीनारायण भगवान जी से पूछा था और लक्ष्मी पति श्री विष्णु भगवान ने मुनि श्रेष्ठ नारद जी को बताया था। उस कथा को मैं तुम सब से कहूँगा। अत: ध्यान से सुनो-
मुनिनाथ सुनो यह सत्यकथा सब कालहि होय महासुखदायी।
भवताप हरै और मनोरथपूर्ण करै सुख सम्पत्ति के अधिकाई।।
अति संकट में दु:ख दूर करै सब ठौर कुठौर में होत सहाई।
भगवान महातम है इसमें अपना कलि में फल और जनाई।।
किसी समय योगीराज नारद जी दूसरों के हित की इच्छा करके सभी लोकों का भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में पहुँचे। यहाँ अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कार्यों के अनुसार अनेक दु:खों से पीडि़त देखकर उन्होंने विचार किया कि कौन यत्न के करने से निश्चित रूप से प्राणियों के दु:खों का अन्त हो सकेगा। ऐसा अपने मन में विचार कर श्री नारद जी विष्णु धाम पहुँचे।
***
दूसरा अध्याय
विष्णुलोक में नारद जी पीतवर्ण और चार भुजाओं वाले देवों के ईश नारायण को, जिनके हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्म से सुशोभित थे तथा जो गले में वरमाला पहने हुए थे, उन्हें देखकर उनकी स्तुति करने लगे। नारद जी विष्णु जी से बोले-
“हे प्रभु! आप अत्यन्त दुर्लभ शक्तियों से युक्त हैं। मन तथा वाणी भी आपको पाने में असमर्थ है। आपका आदि-मध्य-अन्त कोई नहीं जानता। आप निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के दु:खों को हरने वाले हैं। आपको मेरा नमस्कार है।” नारद जी से इस प्रकार की स्तुति सुनकर भगवान लक्ष्मी पति विष्णु जी बोले-
“हे मुनिश्रेष्ठ नारद जी! आपके मन में क्या है? आपका आगमन यहाँ किस कार्यवश हुआ है? नि:संकोच कहो।”
तब नारद जी ने कहा-
“हे प्रभु! मृत्युलोक में सभी प्राणी, जो अनेक योनियों में पैदा हुए हैं, अपने-अपने कर्मों द्वारा अनेक प्रकार के दु:खों से ग्रस्त दु:खी हो रहे हैं। हे नाथ! यदि आप मुझ पर दया रखते हैं तो कृपा कर मुझे बताइये कि उन मनुष्यों के सभी दु:ख थोड़े से ही प्रयत्न से कैसे दूर हो सकते हैं?”
श्री विष्णु भगवान ने कहा-
“हे नारद! मनुष्यों के हित के लिए तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न किया है। जिस व्रत के करने से मनुष्य मोह के बंधन से छूट जाता है, वह व्रत मैं तुमसे कहता हूँ। सुनो! बहुत पुण्य देने वाला, स्वर्ग तथा मृत्युलोक में दुर्लभ एक उत्तम व्रत है जो आज मैं प्रेमवश तुमसे कहता हूँ। श्री सत्यनारायण भगवान का यह व्रत विधि-विधान पूर्वक सम्पन्न करके मनुष्य इस धरती पर सुख भोगकर, मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति करता है।”
श्री विष्णु भगवान के अमृत से ओत-प्रोत वचन सुनकर नारद जी बोले-
“हे प्रतु! उस व्रत का क्या विधान है? इस व्रत को पूर्व समय में किस-किस ने किया है और किस दिन यह व्रत किया जाना चाहिए? कृपया इस व्रत की विधि और विधान मुझे विस्तारपूर्वक कहो। मुझे यह सब सुनने की तीव्र इच्छा है।”
श्री विष्णु भगवान बोले-
“हे नारद! सभी प्राणियों के दु:खों–शोकों को दूर करने वाला यह व्रत सभी स्थानों पर विजयी करने वाला अमोघ अस्त्र है। भक्ति और श्रद्धा से युक्त मनुष्य किसी भी दिन श्री सत्यनारायण भगवान की संध्या के समय ब्राह्मण एवं बंधु-बांधवों सहित धर्मपरायण होकर पूजा करे। भक्ति-भाव से पूर्ण हो नैवेद्य, केले का फल, शहद, घी, शक्कर या गुड़, दूध, गेहूं का आटा सवाया लेवें (गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण भी ले सकते हैं)।”
“इन सबको भक्ति भाव से सम्पन्न हो भगवान श्री सत्यनारायण को अर्पण करें। बंधु-बांधवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराएं, इसके पश्चात् स्वयं भोजन करें। रात्रि में नृत्य-भजन आदि का आयोजन कर श्री सत्यनारायण भगवान का स्मरण करते हुए समय व्यतीत करें। इस तरह जो मनुष्य व्रत करेंगे, उनके समस्त मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होंगे। विशेष रूप से कलि-काल (कलियुग) में मृत्युलोक में यही एक उपाय है जिससे अल्प समय और कम धन में महान पुण्य की प्राप्ति हो सकती है।”
***
तीसरा अध्याय
सूत जी बोले-
“हे ऋषियों! जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है, अब मैं उनका इतिहास कहता हूँ, कृपया आप सब ध्यान से सुनें। सुन्दर काशीपुरी नगरी में अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नित्यप्रति भूख-प्यास से व्याकुल होकर पृथ्वी पर भ्रमण करता था।”
“ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवान ने ब्राह्मण को दु:खी देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करके उस दु:खी व निर्धन ब्राह्मण के समक्ष पहुँचकर आदर के साथ पूछा-
“हे विप्र! तुम नित्यप्रति ही दु:खी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते हो? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! यह सब मुझसे कहो, मैं तुम्हारी व्यथा सुनना चाहता हूँ”।
दरिद्र ब्राह्मण बोला – “मैं एक निर्धन ब्राह्मण हूँ। भिक्षा के लिए नित्यप्रति पृथ्वी पर विचरता हूँ। हे भगवान! यदि आप इस समस्या से छुटकारा पाने का कोई उपाय जानते हो तो कृपा करके मुझसे कहें।”
वृद्ध ब्राह्मण रूप में विष्णु जी बोले-
“हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं। अत: तुम उनका पूजन करो, इस व्रत को करने से मनुष्य दु:खों से मुक्त हो जाता है।”
दरिद्र ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बतलाकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले श्री सत्यनारायण भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।
“जिस व्रत के विषय में मुझे वृद्ध ब्राह्मण ने बतलाया है, मैं उस व्रत को अवश्य ही करूंगा।”
ऐसा मन में निश्चय कर वह निर्धन ब्राह्मण अपने घर पहुँचा। परन्तु उस रात्रि उस ब्राह्मण को नींद नहीं आई। अगले दिन वह जल्दी उठा और श्री सत्यनारायण भगवान का ध्यान कर, उनका व्रत करने का निश्चय कर भिक्षा मांगने के लिये चल पड़ा। उस दिन उस दरिद्र ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत-सा धन मिला, जिससे उसने पूजन का सब सामान खरीद कर, घर आकर अपने बंधु-बांधवों के साथ भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया, जिसके करने से वह दरिद्र ब्राह्मण सब दु:खों से छूटकर अनेक प्रकार की सम्पत्तियों से युक्त हो गया। तब से वह प्रत्येक मास व्रत करने लगा।
श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य शास्त्रविधि के अनुसार श्रद्धापूर्वक करेगा वह सब पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होगा। आगे जो मनुष्य पृथ्वी पर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करेगा वह अपने सभी दु:खों से छूट जाएगा। इस तरह नारद जी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ व्रत मैंने तुमसे कहा। हे विप्र! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं मुझसे कहें?”
तब ऋषियों ने कहा-
“हे मुनिश्वर! संसार में उस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया? हम सब सुनना चाहते हैं, हमारे मन में यह सब सुनने की इच्छा व श्रद्धा है।”
श्री सूत जी ने कहा-
“हे मुनियों! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है उन सबकी कथा ध्यानपूर्वक सुनो-
एक समय वह ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बंधु-बांधवों सहित अपने घर पर व्रत कर रहा था। उसी समय एक बूढ़ा लकड़हारा (लकड़ी बेचने वाला) वहाँ आया। उसने सिर पर रखा लकडि़यों का गट्ठर बाहर रख दिया और उस ब्राह्मण के घर में चला गया। प्यास से व्याकुल लकड़हारे ने उस ब्राह्मण को व्रत करते हुए देखा। वह प्यास को भूलकर उस ब्राह्मण को नमस्कार कर पूछने लगा-
“हे ब्राह्मण देवता! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? कृपा कर मुझे बताइये इसे सुनने की मेरी इच्छा है।”
ब्राह्मण उस वृद्ध लकड़हारे से बोला – “हे भाई! यह सब मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी ही कृपा से मेरे घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि की वृद्धि हुई है।”
ब्राह्मण से श्री सत्यनारायण भगवान व्रत के विषय में जानकर वह लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान का चरणामृत ले, प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात् भोजन कर वह अपने घर पहुँचा।
अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज नगर में लकड़ी बेचने पर जो धन मिलेगा उसी से मैं भगवान श्री सत्यनारायण जी का उत्तम व्रत, विधिपूर्वक करूंगा। ऐसा मन में विचार कर वह लकड़हारा लकडि़यों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे उस नगर में गया। उस दिन उसे उन लकडि़यों के दाम पहले दिन से चौगुने मिले। तब वह बूढ़ा लकड़हारा अति प्रसन्न हो पके केले की फली, शक्कर, शहद, दूध, घी, दही और गेहूं का चूर्ण इत्यादि सामान श्री सत्यनारायण जी के व्रत हेतु लेकर अपने घर आ गया। उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजन और व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन, पुत्र आदि से युक्त हो, संसार के समस्त सुख भोगकर, अन्त में बैकुण्ठ धाम को चला गया।
***
चौथा अध्याय
श्री सूत जी बोले-
“हे श्रेष्ठ मुनियों! अब आगे की एक कथा कहता हूँ। पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक महान बुद्धिमान राजा राज्य करता था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। वह प्रतिदिन देव स्थान पर जाकर गरीबों को धन देकर उनके कष्टों को दूर करता था। उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली सती साध्वी थी।
भद्रशीला नदी के तट पर उन्होंने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उस समय वहाँ साधु नाम का एक वैश्य व्यापारी आया। उसके पास व्यापार हेतु बहुत-सा धन था। वह वैश्य नाव को किनारे पर ठहराकर राजा के पास आया। राजा को व्रत करते देखकर विनयशील वाणी से बोला-
“भक्तियुक्त चित से आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है, कृपया आप मुझे सविस्तार बतायें।”
महाराज उल्कामुख ने कहा-
“हे साधु वैश्य! मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ पुत्र की प्राप्ति हेतु सर्वशक्ति सम्पन्न महान शक्तिशाली सत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूँ।”
राजा के भक्तियुक्त वचनों को सुनकर उस साधु नामक वैश्य ने आदर से कहा-
“हे राजन! मुझे भी इस व्रत का सम्पूर्ण विधान समझायें। मैं भी आपके कथनानुसार इस व्रत को अवश्य करूंगा। मैं भी संतानहीन हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है, कि इस व्रत के करने से निश्चय ही मुझे भी संतान की प्राप्ति होगी।”
राजा से व्रत का सब विधान सुनकर व्यापार से निवृत्त हो, वह वैश्य व्यापारी आनन्द के साथ अपने घर पहुँचा। उस वैश्य ने अपने पत्नी लीलावती से संतान देने वाले उस व्रत का सम्पूर्ण वृतान्त कह सुनाया और स्वयं प्रण किया कि जब मेरे संतान होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा।
एक दिन उसकी पत्नी लीलावती आनन्दित हो, संसारिक धर्म में प्रवृत्त होकर श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसने एक सुन्दर कन्या को जन्म दिया। दिनों-दिन वह कन्या इस तरह बढ़ने लगी जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा बढ़ता है। कन्या का नाम कलावती रखा गया। तब एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को स्मरण कराया-
“हे प्रिये! मैं कन्या के विवाह पर इस व्रत को करूंगा।” इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह साधु वैश्य अपने व्यापार को करने दूसरे नगर चला गया। कलावती पितृ गृह में वृद्धि को प्राप्त हो गई।
एक दिन साधु ने जब अपने पुत्री को नगर में सखियों के साथ खेलते देखा तो एक दूत को बुलाकर कहा-
“हे दूत! हमारी पुत्री हेतु कोई सुयोग्य वर तलाश करके लाओ।”
उसकी आज्ञा सुनकर दूत कंचन नगर पहुँचा और देख-भाल कर वैश्य की पुत्री हेतु एक सुयोग्य सुशील वाणिक पुत्र का विवाह उस वाणिक पुत्र के साथ कर दिया। परन्तु दुर्भाग्यवश वह विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया। इस पर श्री भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने वैश्य को श्राप दिया कि तुम्हें दारुण दु:ख प्राप्त होगा।
अपने कार्य में दक्ष वैश्य अपने जमाई सहित नावों को लेकर व्यापार के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक नगर में पहुँचा। दोनों ससुर-जमाई चन्द्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से प्रेरित हो एक चोर राजा का धन चुरा कर भागा जा रहा था। राजा के सैनिकों को अपने पीछे तेजी से आते दिेखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को वहीं नाव में चुप-चाप रख दिया। जहाँ वे दोनों ससुर-जमाई ठहरे हुए थे और स्वयं वहाँ से भाग गया।
जब सैनिकों ने उस वैश्य के पास राजा के धन को रखा हुआ देखा तो दोनों को बांधकर राजदरबार में ले गये और राजा के समीप उन दोनों ससुर-जमाई को ले जा कर बोले-”
“हे राजन! हम ये दो चोर पकड़ कर लाए हैं। देख कर आज्ञा दें।”
तब राजा की आज्ञा से उन्हें कठिन कारावास में डाल दिया गया तथा उनका सारा धन छीन लिया गया।
***
पाँचवा अध्याय
श्री सत्यनारायण भगवान के श्राप के कारण साधु वैश्य की पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर अत्याधिक दु:खी हुई। उनके घर पर रखा धन चोर चुरा कर ले गए। शारीरिक व मानसिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अति दु:खित हो भोजन की चिंता में लीलावती की कन्या कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने ब्राह्मण को श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करते देखा। उसने कथा सुनी तथा प्रसाद ग्रहण कर रात को घर गई।
लीलावती ने अपनी पुत्री कलावती से पूछा-
“हे पुत्री! तू अब तक कहाँ रही व तेरे मन में क्या है?”
कलावती बोली- “हे माता! मैं ब्राह्मण के घर कुछ भोजन के लिए गई थी। मैंने वहाँ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा। इसीलिए मुझे वहाँ देर हो गई।”
कन्या के वचनों को सुनकर लीलावती श्री सत्यनारायण भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी। उसने परिवार व बंधु-बांधवों सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन व व्रत किया और वर मांगा कि – “मेरे पति और दामाद शीघ्र ही लौट आएं।” और साथ ही अपने अपराधों के लिए श्री सत्यनारायण भगवान से क्षमा याचना की। श्री सत्यनारायण भगवान जी लीलावती के इस व्रत व पूजन से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा –
“हे राजन! जिन दोनों वैश्यों को तुमने बंदी बना रखा है, वे निर्दोष हैं। उन्हें प्रात: ही छोड़ दो। उनका सब धन जो तुमने ग्रहण किया है, उसे लौटा दो, अन्यथा मैं तेरा धन, राज्य, पुत्रादि सब नष्ट कर दूंगा।” राजा को ऐसे वचन कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गए। प्रात:काल राजा चंद्रकेतु ने सभा में सब को अपना स्वप्न कह सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वाणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाया जाए। दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा ने कोमल वचनों से उनका सत्कार करते हुए कहा – “हे महानुभावों! तुम्हें दुर्भाग्यवश ऐसा कठिन दु:ख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं। तुम अब मुक्त हो।”
ऐसा कहकर राजा ने उनको नए-नए वस्त्राभूषण पहनाए तथा उनका जितना भी धन लिया था, उससे दूना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिये।
***
छठा अध्याय
श्री सूत जी बोले- “वैय ने मंगलाचार करके यात्रा आरम्भ की और अपने नगर को चला। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दण्डी वेशधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने उनसे पूछा – “हे साधु! तेरी नाव में क्या है?”
अभिमानी वाणिक हँसता हुआ बोला – “हे दण्डी! आप क्यों पूछते हैं? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं।”
वैश्य का कठोर वचन सुनकर दण्डी वेशधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने कहा –
“तुम्हारा वचन सत्य हो!” ऐसा कहकर दण्डी वेशधारी वहाँ से चले गए और कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए। दण्डी महाराज के जाने के पश्चात् वैश्य ने नित्य-क्रिया से निवृत्त होने के बाद नाव को ऊँची उठी देखकर अचम्भा किया तथा नाव में बेल-बच्चे आदि देखकर मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। मूर्छा खुलने पर शोक प्रकट करने लगा। तब उसके जमाई ने कहा-
“आप शोक न करो, यह दण्डी महाराज का श्राप है, अत: उनकी शरण में ही चलना चाहिए। तभी हमारी मनोकामना पूर्ण होगी।”
जमाई के वचन सुनकर वैश्य दण्डी महाराज के पास पहुँचा और अत्यन्त भक्ति भाव से प्रणाम करके बोला – “मैने जो आपसे असत्य वचन कहे थे, उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।”
ऐसा कहकर वह बहुत दु:खी होकर रोने लगा। तब दण्डी भगवान बोले – “हे वाणिक पुत्र! मेरे श्राप से बार-बार तुझे दु:ख प्राप्त हुआ है। तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है।”
वैश्य ने कहा – “हे भगवन्! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जान पाते, तब मैं अज्ञानी भला कैसे जान सकता हूँ? आप प्रसन्न होइए, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मेरी रक्षा करो, और पहले के समान मेरी नौका को धन से परिपूर्ण कर दो।”
उसके भक्ति युक्त वचनों को सुनकर श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और उसको इच्छानुसार वर देकर अन्तर्ध्यान हो गए। तब श्वसुर व जमाई दोनों ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से पूर्ण है। फिर वह भगवान सत्यनारायण का पूजन कर साथियों सहित अपने नगर को चल दिये।
जब वह अपने नगर के निकट पहँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा। दूत ने वैश्य के घर जाकर उसकी पत्नी को नमस्कार किया और कहा-
“आपके पति अपने दामाद सहित इस नगर के समीप आ गए हैं।”
लीलावती और उसकी पत्नी कलावती उस समय भगवान की पूजा कर रही थीं। दूत के वचनों को सुनकर साधु की पत्नी ने अत्यन्त हर्ष के साथ सत्यदेव का पूजन पूर्ण कर अपनी पुत्री से कहा – “मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ। तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जाना।” मां के जाते ही पुत्री कलावती पूजन एवं प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शन के लिये चली गई।
प्रसाद की अवज्ञा के कारण, सत्यदेव ने रुष्ठ होकर उसके पति को नाव सहित पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को न देखकर रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी। अपने जमाई और पुत्री की दशा देखकर साधु वैश्य बोला-
“हे प्रभु! मुझ से या मेरे परिवार से जो भूल हुई है, उसे क्षमा करो।”
उसके दीन वचनों को सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गए। आकाशवाणी हुई – “हे वैश्य! तेरी कन्या मेरा प्रसाद छोड़कर आई है, अत: इसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण कर लौटे तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा।”
आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुँचकर प्रसाद खाया और फिर आकर अपने पति के दर्शन किये। तत्पश्चात् वैश्य ने वहीं बंधु-बांधवों सहित भगवान सत्यनारायण का विधि पूर्वक पूजन किया। वह इस लोक का सुख भोगकर अन्त में स्वर्ग लोक को गया।
***
सातवाँ अध्याय
श्री सूत जी ने आगे कहा-
“हे ऋषियों! मैं एक और भी कथा कहता हूँ। सुनो! प्रजापालन में लीन तुगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यनारायन देव का प्रसाद त्याग कर बहुत दु:ख पाया। एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से बंधुओं सहित श्री सत्यनारायन जी का पूजन करते देखा। राजा अहंकारवश वहाँ नहीं गया और ना ही प्रसाद खाया। प्रसाद त्यागकर अपने नगर को गया तो वहाँ उसने सब कुछ नष्ट पाया।
वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यनारायण ने ही किया है। तब वह उसी स्थान पर आया और ग्वालों के संग विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद खाया तो सत्यनारायण की कृपा से सब कुछ पहले जैसा ही हो गया और मरने पर स्वर्ग लोक को गया। जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करेगा, श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन, धनी और बन्दी, बंधन से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है।
संतानहीन को संतान प्राप्त होती है, तथा सब मनोरथ पूर्ण होकर अंत में वह बैकुण्ठ धाम को जाता है। जिन्होंने पहले इस व्रत को किया, अब उसके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिए। शतानन्द नामक वृद्ध ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्री कृष्ण की भक्ति कर, मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम के महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रंगनाथ का पूजन कर बैकुण्ठ को प्राप्त हुए। साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष प्राप्त किया। महाराज तुंगध्वज स्वयंभू मनु हुए। उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कर मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भील अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा हुआ जिसने भगवान राम के चरणों की सेवा कर मोक्ष प्राप्त किया।
।।इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा सप्तम् अध्याय सम्पूर्ण।।
ЁЯХЙя╕П Latest Events
тЬи Share Your Anubhav
Your spiritual experiences inspire others on this divine path.
Submit Anubhav