Durga Stuti (1)

ЁЯзШ Category: Stuti ЁЯУЕ 20/12/14

 

 

  श्री दुर्गा स्‍तुति:  

 

 

जय गणपति गुरू देव शिवा शिव शेष शारदा।

माँ दुर्गे हम करते तुम्‍हें प्रणाम सर्वदा।।

रौद्र रूप दृग अरुण विशेष क्रोध के कारण।

भक्‍त त्राण हित अस्‍त्र शस्‍त्र करती हो धारण।।

अखिल भुवन में है भर रहा प्रकाश तुम्‍हारा।

रहे भगवती मम उर मध्‍य निवास तुम्‍हारा।।

तुम होकर अव‍तरित किया करती हो क्रीड़ा।

भू, भू-सुर, सन्‍तों की हरती हो पीड़ा।।

निश-दिन जो जन तुमको भजे अनन्‍य भाव से।

छूटे सद्य त्रिताप पाप के दुष्‍प्रभाव से।।

भक्ति मुक्ति देती है आराधना तुम्‍हारी।

पूर्ण करो अविलम्‍ब देवी कामना हमारी।।

भक्‍त वत्सला भव्‍या भव मोचनी भवानी।

गुण गाते गन्‍धर्व सर्व सुर नर मुनि ज्ञानी।।

होकर श्रद्धा युक्त शरण में जो आता है।

वह सुर दुर्लभ नित्‍य परम पद को पाता है।।

करे तुम्‍हारा यजन जीव जो तन मन धन से।

उन्‍हें मुक्त रिती हो माया के बन्‍धन से।।

नाश करो माँ मेरे अज्ञानांधकार का।

हो निर्मल मन रहे न उर अंकुर विकार का।।

प्राप्‍त किया तुम से अखण्‍ड सम्राज्‍य सुरथ ने।

किसे न किया कृतार्थ भक्ति के पावन पथ ने।।

जब समाधि ने देवी तुम्‍हारा ध्‍यान किया था।

तुमने उसको सबसे उत्‍तम ज्ञान दिया था।।

दो वरदान मुझे मैं होकर युक्‍त धर्म से।

बनूँ कल्कि कमलेश भक्‍त मन वचन कर्म से।।

अपने जन को दिव्‍य शक्ति सम्‍पन्‍न करो माँ।

परम शान्ति सुख देकर चित प्रसन्न करो माँ।।

सात्विक बुद्धि प्रदान करो कलि कलुष हटाओ।

मम रसना से पल पल कल्कि नाम रटाओ।।

व्‍यापक है तब तेज भूमि पाताल व्‍योम में।

जड़ चेतन सम्‍पूर्ण सृष्टि के रोम रोम में।।

प्रिय है तुमको वेद धर्म मर्यादा पालन।

मर्यादा से होता लोकों का संचालन।।

वसुधा पर जब दैत्‍य दुष्‍ट दल बढ़ जाते हैं।

बल वैभव के उच्‍च शिखर पर चढ़ जाते हैं।।

वे मदान्‍ध हो करते जब उपहास तुम्‍हारा।

अखिल विश्‍व तब बन जाता है ग्रास तुम्‍हारा।।

होती हो तुम तृप्‍त रक्‍त असुरों का पीकर।

गेंद समान गिराती हो नर मुण्‍ड मही पर।।

असुर शवों से जब यह पृथ्‍वी पट जाती है।

तभी पाप की गहन कालिमा हट जाती है।।

चलती है जब क्रूर कठिन करवाल तुम्‍हारी।

सौम्‍य मूर्ति बन जाती है विकराल तुम्‍हारी।।

अट्टहास कर माँ जिस बार गरजती हो तुम।

युद्ध भूमि में क्रुद्ध सिंह पर सजती हो तुम।।

जब कि भार से शेष शक्ति घटने लगती है।

जलनिधि जाते खौल धरा फटने लगती है।।

होत क्षितिज में लीन गगनचुम्‍बी चट्टाने।

समल सृष्टि को लगते ज्‍वालामुखी जलाने।।

महा मेघ सम्‍वर्त काल के दृश्‍य दिखाते।

सप्‍त सिन्‍धु मर्याद हीन होकर लहराते।।

अति विक्षुब्‍ध प्रकृति के ध्‍वंस मयी तांडव से।

भर जाती सम्‍पूर्ण दिशाएँ भीषण रव से।।

मार्तण्‍ड जब हो प्रचण्‍ड तपने लगते हैं।

त्राहि त्राहि कर जीव तुम्‍हें जपने लगते हैं।

देती हो तब आर्त प्राणियों को जित आश्रय।

करती हो खल म्‍लेच्‍छ यवन दल बौद्धों का क्षय।।

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